शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को

शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को

उस सदा अनंत अनादि अनन्य अनारत को, हूं शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को।

शिव जटा मध्य से निकली जाह्नवी अविचल को श्री कृष्ण प्रिया यमुना के कलकल बहते जल को मानसर जिसका उद्गम उस ब्रह्मपुत्र के पाट को, ऋषि गौतम के तप की फल गोदावरी विराट को। उस सदा अनंत अनादि अनन्य अनारत को, हूं शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को।

भूधर विशाल हिमाद्रि जिसके शीर्ष पर आसीन है धोता सिंधु जिसके पद वह भारत भूमि नवीन है विंध्याचल सप्तपुरा शिवालिक पर्वत शेषाद्री को अर्बुद आरावली निलगिरी तथा शुभ्र सह्याद्रि को उस सदा अनंत अनादि अनन्य अनारत को, हूं शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को।

नाना वस्त्र नाना वेश भाषा विभिन्न जहां हैं, किंतु सब के मन में भाव अभिन्न जहां है वीणा मृदंग वंशी की धुन से गुंजित वसुंधरा को, नाट्य कला नृत्य की झंकार से झंकृत धरा को, उस सदा अनंत अनादि अनन्य अनारत को, हूं शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को।

बुद्ध को बोध कराने वाला है यह देश धन्य, वर्धमान महावीर की जन्मस्थली है यह अनन्य, साकेतपुरी में पुरुषोत्तम राम के चरणरज को, कृष्ण का प्राकट्य जहां उस पावन भूमि ब्रज को। उस सदा अनंत अनादि अनन्य अनारत को, हूं शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को।

इतिहास सबसे प्राचीन किंतु देश सर्व नवीन है, साहित्य, शिल्प संगीत में जो सर्वथा प्रवीण है, उस देवभूमि पावन निर्मल सर्ववंदित सेवारत को, आराध्य अकाट्य अखंड अपूर्व भूमि भारत को उस सदा अनंत अनादि अनन्य अनारत को, हूं शीश झुकाता मैं सदा अद्भुत भूमि भारत को।

Aradhya Chaturvedi