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मैं आर्यावर्त की बेटी स्वप्न एक सजाती हूं
कलुषित न हो हिर्दय घृणा से
प्रेम का दीप जलाती हूं
मैं आर्यावर्त की बेटी स्वप्न एक सजाती हूं
विवेकानंद सा ज्ञान हो नव पीढी का
मानवता को धर्म से बढकर बताती हूं
मैं आर्यावर्त की बेटी स्वप्न एक सजाती हूं
बेटियां हो लक्ष्मीबाई सी निडर भारतखंड की
बेटों में भगतसिंह सा तेज चाहती हूं
मैं आर्यावर्त की बेटी स्वप्न एक सजाती हूं
भूखंड हो समरसता से परिपूर्ण
हिर्दय से द्वेष कपट मिटाती हूं
मैं आर्यावर्त की बेटी स्वप्न एक सजाती हूं
कीर्ति हो चारों दिशाओं में हिन्द की
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सबको भाई बताती हूं
मैं आर्यावर्त की बेटी स्वप्न एक सजाती हूं
मैं आर्यावर्त की बेटी स्वप्न एक सजाती हूं
✍दामिनी चतुर्वेदी
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शब्द जब शून्य होने लगे
अंतर्मन भी रोने लगे
इंसानियत जब खत्म होने लगे
मुझे तब आदमकद इन्सान भी बौने लगे
घाव दिल पर होने लगे
अश्रु की धार भावनाओं को धोने लगे
कद्र न हो नेक भावनाओं की जब
ईश्वर की बनाई दुनिया में
मुझे मानवता रहित सब खिलौने लगे
नेक कर्म पर भी सवाल खडे होने लगे
सीता कठघरे में खड़ी रोने लगे
अपशब्द नारी के प्रति जब प्रयोग होने लगे
मुझे मानव रावण और दुर्योधन से भी ज्यादा तुच्छ और घिनौने लगे
धर्म जात पर दंगे होने लगे
मानव मानवता को खोने लगे
भारतवर्ष 'सर्वधर्म सदभाव 'का प्रतीक है
मुझे ये कथन भी असत्य प्रतीत होने लगे ।
✍दामिनी चतुर्वेदी
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