माथुर चतुर्वेदी समाज एक विहंगावलोकन

माथुर चतुर्वेदी समाज एक विहंगावलोकन 

"चतुरो वेदानधीते इति चतुर्वेदः"  चतुर्वेदी शब्द कल्पद्रुम के अनुसार चारों वेदों के जो ज्ञाता थे वे चतुर्वेदी कहलाए अनेक ग्रंथों  में इस जाति के संबंध में अनेक प्रकार की बातें लिखी जिससे उनकी महत्ता सो स्पष्ट होती है पुराण ग्रंथ तो उनकी प्रशंसा में भारी पड़े हैं 

"माथुरा मम् रूपा हि , माथुरा मम् वल्लभा ।

माथुरे परितुष्टे तु, तुष्टोsहं  नात्र  संशयः ।।" 
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"न केशव समो देवो, न माथुर समो द्विजः" आदि 

इस समाज की द्रष्टव्य  बातें निम्न है 

समाज का मूल स्थल : मथुरा 
वर्ण जाति : वैदिक सनातनी ब्राह्मण माथुर चतुर्वेदी 
समाज का वेद:  ऋग्वेद सामवेद 
वेद की शाखाएं:  ऋग्वेद की अश्वलायिनी ,  सामवेद की रारायणी ज्ञाता :  चारों वेदों के अतः चतुर्वेदी प्रसिद्ध 
गोत्र:  सात  (दक्ष, कुत्स्, धौम्य,  सौश्रवस्,  वशिष्ठ, भार्गव, भरद्वाज) प्रवर:  तीन किंतु भार्गव गोत्र के पांच 
अल्ल् :  (उपनाम) 64 

माथुर चतुर्वेदियों   के 6 गोत्रों का संबंध ऋग्वेद से तथा एक गोत्र का संबंध सामवेद की रारायणी शाखा से है भारत के ब्राह्मण समाज में किसी समाज का दो वेदों से संबंध होना विचारणीय एवं अन्वेषणीय् है इस समाज में ऋग्वैदियों की कुलदेवी श्री महाविद्या जी एवं सामवेदियों  की श्री चर्चिका हैं:

वैदिक काल

 
वेद में इतिहास ढूंढना विद्वानों के प्रतिकूल रहा है वह तो अपौरुषेय् है ईश्वर के नि:श्वास भूत है तथापि  जब वेद के ऋषियों का उल्लेख होता है तो समाज के गोत्र प्रवर्तक नाम भी वहाँ  उपलब्ध होते हैं और इस प्रकार नाम उपलब्धि से समाज भी अपना अस्तित्व वैदिक काल से संयुक्त करता आ रहा है 

स्मृति काल 
 स्मृतियों में इनका उल्लेख अनेक बार आया है 

मनुस्मृति के 

"एतद्देश् प्रसूतस्य् सकाशादग्र् जन्मन्ः

रचं स्वं चरित्रं शिक्षरेन्, पृथिव्यां सर्व मानवाः"

अर्थात "इस ब्रह्मर्णि देश से उत्पन्न ब्राह्मणों से पृथ्वी के मानवों ने अपना चरित्र समझा" इस वाक्य से उनके पांडित्य  और चरित्र की महत्ता  स्पष्ट होती है। 

रामायण काल 
वाल्मीकि रामायण में यमुनातीर वासियों  द्वारा अयोध्या जाकर भगवान श्री राम से लवणासुर  के अत्याचार का वर्णन किया और शत्रुघ्न जी ने आकर उनके कष्ट का निवारण किया तथा मथुरा की स्थिति संभाली 

भार्गव्यच्यवनं चैव पुरुस्कृत्य महर्षयः

प्रीयमाणा नर व्याघ्र यमुनातीर् वासिनः

(वा.रा.पु.का.६०१३)

 इससे भार्गव मुनि एवं च्यवन प्रवर वाले माथुरों  का बोध स्पष्ट होता है ब्रह्म भोज  के निमित्त श्री राम का घंटा प्रतिदिन 36000 विप्रो के एकत्रित होने पर स्वत: बजता था परंतु यमुना तीर वासी चतुर्वेदियों  के अल्पसंख्या में पहुंचने पर बज गया था और रहस्य पूछने पर वशिष्ठ जी ने एक माथुर ब्राह्मण को भोजन कराने से हजारों विप्रो को भोजन कराने तुल्य माना था 

पुराण काल 
पुराणों में अनेक । स्थलों पर माथुरों  की महिमा है स्कंद पुराण के अनुसार वीरान मथुरा में माथुर ब्राह्मण ही द्वारका से आकर बसे थे तथा जरा जरासंध द्वारा उजाड़ी मथुरा को समृद्ध किया था (स्कंद पुराण भागवत महात्म्य)  वराह पुराण में सर्वाधिक माथुर ब्राह्मणों की महिमा वर्णित की गई है "न माथुर समो द्विज" कहकर तो प्रशंसा की अति  कर दी है।  पद्म पुराण में माना गया है कि माथुर ब्राह्मणों ने यहां तप  किया अतः इसका नाम "माथुर मंडल" पड़ा।  नारद पुराण ने "माथुर परिमंडल भू" लिखा है।  अन्य पुराणों में भी माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों की महत्ता है।  पुराण और साढ़े पाँच सौ  वर्ष पूर्व प्रकट महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य के मध्यकाल का इतिहास काल के गर्भ में ही रहा है।  कहीं-कहीं कोई सामग्री मिली भी तो वह पर्याप्त प्रकाश डालने में समर्थ नहीं है।  ईसा  से पूर्व के मानिषियों में  महर्षि पाणिनी का नाम उल्लेखनीय है।  स्पष्ट रूप से तो पाणिनी  ने  माथुरों  का उल्लेख नहीं किया परंतु "दासी पुत्र" से दक्ष गोत्र का संबंध बताया जा सकता है ऐसा विद्वानों का मत रहा है। 

"माथुरा  पाटिल पुत्रकेभ्य आढ्यतरा:"  में अवश्य माथुरों  की श्रेष्ठता  वैयाकरण स्वीकार करते हैं। 

बुद्ध माला 
बुद्ध धर्म से संबंधित साहित्य में "मधुरसुत्त"   प्रसिद्ध है।  इसमें बुद्ध निर्वाण के पश्चात मथुरा का राजा "अवंति पुत्र" लिखा है (भरत सिंह पाली साहित्य का इतिहास पृष्ठ 176) इसका मथुरा के वृंदावन में होना लिखा है।  संभवतय: यह  वृंदावन है।  भगवान बुद्ध ने मथुरा के पांच दोषों का उल्लेख किया है और लिखा है कि यहां के लोग बौद्ध श्रमणों को भिक्षा भी नहीं देते।  स्पष्टत:  यह माथुरों  के लिए है।  "ब्राह्मण संयुक्त" में भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण की प्रव्रज्या  का वर्णन है। 

राजा नंद ने "शूरसेन प्रदेश" की स्वतंत्रता का हरण किया था और इसे अपने राज्य में मिलाया था। नंद के अत्याचारों ने माथुरों को अत्यंत दुखित किया था तथा संभवतय: चतुर्वेदियों  के मथुरा से पलायन की स्थिति तभी से बन गई। 

कनिष्क कल में भी माथुरों का गौरव रहा था।  मथुरा के राजकीय संग्रहालय में संकलित  यज्ञ  स्तंभ में लिखा है - "कनिष्क के वंशज वासिष्क के राज्य काल में माथुर ब्राह्मणों ने एक वृहद यज्ञ करवाया था इस लेख का मूल हिंदी अनुवाद इस प्रकार है:

"वासिष्क के राज्य संवत 24 वे वर्ष ग्रीष्म के चतुर्थ मास के तीसवे  दिवस में रुद्रल  के पुत्र द्रोणल  ब्राह्मण  भारद्वाज माथुर सामवेदी  की ने द्वादश रात्र  यज्ञ कराकर यूप  स्थापित किया।" 

 कंस के समय यज्ञपत्नी शब्द इन ब्राह्मणों की पत्नियों के लिए आया है तथा यज्ञ में दीक्षित होने का उल्लेख है इसके बाद भी अनेक यज्ञ आदि कराए होंगे परंतु वे  काल के गाल में चले गए किंतु यह यज्ञ स्तंभ तो परंपरा का पुष्ट  प्रमाण है।  बाद में उदयपुर के राजा संग्राम सिंह,  ओरछा के वीर सिंह जयपुर के भारमल, काशी के भूप नारायण तथा रीवा नरेश के साथ महाराज शिवाजी का मथुरा आकर माथुरों  का आतिथ्य  प्राप्त करना तथा उनका मान करना उल्लेखनीय है।  स्वतंत्र भारत में देश के हर राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस समाज की प्रतिभाओं का किसी न किसी रूप में सम्मान किया है ऐसा समाज अपने  स्वरूप को यथावत रखने का प्रयास करें ऐसी प्रभु से कामना है। 
 

प्रधानाचार्य 
श्री द्वारकेश उ माध्यमिक संस्कृत विद्यालय 
श्री द्वारकाधीश मंदिर 
मथुरा 
उत्तर प्रदेश
 

Dr Sahdev Krishna Chaturvedi